
बह रही है चाँदनी जैसे पिघलकर,
चाँग भी चलने लगा थोड़ा सम्हलकर ।
ख़्वाहिशें रंगीनियों की मुंतज़िर थीं,
याद ने दस्तक दिए कपड़े बदलकर ।
है अजब-से रंग में डूबा समंदर,
और लहरे बह रहीं थोड़ा उछलकर ।
है फिज़ाओं में वही खुशबू घुली सी,
लग रहा वह आ गए जैसे टहलकर ।
वस्ल की नाकामियों का हश्र है कि,
एक बच्चा रो रहा जैसे मचलकर ।
तेज़ लहरें फिर जिगर को धो गई हैं,
जख्म सारे आ गए बाहर निकलकर ।
By- www.srijangatha.com
No comments:
Post a Comment