
डाल-डाल खाए हिचकोले
फागुन आया री ।
मधुर-मधुर कोयलिया बोले,
फागुन आया री ।
सरसों पहने पीत चुनरिया,
झूमे गेहूँ-बाली ।
अगरु-गंध सनायी धरती,
महके महुआ डाली ।
कलियों-कलियों ने मुँह खोले,
फागुन आया री।
मंजरियों पर भंवरे डोलें
फागुन आया री ।
पात-पात झर गए ढाक के,
वन-पलाश भी दहके ।
मदन चलाए बाण काम के,
तन-मन बेसुध बहके।
पुरवा गाए हौले-हौले,
फागुन आया री ।
अधर सँजोए शब्द अबोले,
फागुन आया री ।
अमरैया के शिखर-शिखर पर,
प्रणय-गान के गुंजन।
बिखर गयी है पंगडंडी में,
अक्षत, रोली, चंदन।
मन का सगुना अनहद बोले,
फागुन आया री।
भीतर के गठबंधन खोले
फागु आया री ।
डाल-डाल खाए हिचकोले,
फागुन आया री ।
मधुर-मधुर कोयलिया बोले,
फागुन आया री ।
********************
By- www.srijangatha.com
********************
No comments:
Post a Comment