
सूरज है ढलने को संध्या की बेला है,
भीगी-सी पलकों पर यादों का मेला है।
हौले से चलकर के पुरवाई बहती है,
कानों में धीरे से जाने क्या कहती है,
मन के तटबंधों पर सागर का रेला है ।
पेड़ों की टहनी पर कलरव की तानें हैं,
ऐसे में हम खुद से बेसुध अन्जाने हैं ।
विधना की बातें हैं, क़िस्मत का खेला है ।
तारों के झुरमुट में चंदा की डोली है,
मिश्री–सी रसभीनी चकवे की बोली है ।
प्राणों का पंछी ही बिलकुल अकेला है ।
सूरज है ढलने को संध्या की बेला है,
भीगी-सी पलकों पर यादों का मेला है ।
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By- www.srijangatha.com
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