
ज्ञान का पहिया हुआ गतिमान यारो ।
आदमी अब हो गया भगवान यारो ।
साधुओं का भेष धर के आदमी ही,
आदमी को दे रहा व्याख्यान यारो ।
छल-कपट और पाप का व्यापार करके,
आदमी होने लगा धनवान यारो ।
दूरियाँ कमतर हुईं पर आज भी है,
आदमी से आदमी अनजान यारो ।
लोक-लज्जा त्याग देना, आदमी की,
सभ्यता का बन गया प्रतिमान यारो ।
आदमी अवसाद का पर्याय केवल,
खो गई उसकी सहज मुस्कान यारो ।
देवता भी क़ैद में हैं, आदमी से-
माँगता है मुक्ति का बरदान यारो ।
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By- www.srijangatha.com
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