Tuesday, August 08, 2006

कबीरा


सबकी अपनी चाह कबीरा,
अपनी-अपनी राह कबीरा ।

ढाइ आखर की बातों की,
किसको है परवाह कबीरा ?

सबकी आँखें भीगी-भीगी,
अधरों पर है आह कबीरा ।

पीर बहुत है भीतर गहरी,
कैसे पाएं थाह कबीरा ।

कुएँ पर गाडर का रेला,
कौन करे आगाह कबीरा ।

भीतर गहरी ख़ामोशी है,
जैसे हो दरगाह कबीरा ।

सबके चेहरों पर आ बैठा,
थका हुआ उत्साह कबीरा ।

निर्धन होती मर्यादाएँ ,
कैसे हो निर्वाह कबीरा ।

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By- www.srijangatha.com
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2 comments:

renu ahuja said...

वाह, यह दो पंक्तियां मानव मन के अंतरमन की दशा का स्प्ष्ट बखान कर रही है,

पीर बहुत है भीतर गहरी,
कैसे पाएं थाह कबीरा ।

अजय जी,
हम कहेंगे इतना ही,

"बखान करे जो मन की पीरा
गीत वही साचा कबीरा."
-श्रीमति रेणू आहूजा.kavyagagan.blogspo.com

निखिल आनन्द गिरि / सोहैल आज़म said...

hum to bas itna hi kahenge,
aah kabira,wah kabira!!